Tuesday, 16 November 2021

फिर कभी...

 

एक कहानी थोड़ी पुरानी सी थी,

कुछ नये पन्ने जोड़ने चली,

कलम उठाई तो जाना स्याही खतम है,

सो दवात खोजने निकल पड़ी ।


फिर देखा फूल पत्तियां सारी हैं बिखरी हुई,

कल रात जोरों की बारिश जो हुई,

कपड़े भी थे आधे गीले कुछ आधे सूखे,

सो थोड़ी जो धूप दिखी मैं दौड़ चली ।


रोटी सीकीं तो कभी सब्जियों में करछी चली,

दूध भी उबल कर थोड़ी गिर गई,

फिर मैं भागी छोटे बड़े सबके पीछे,

और डिब्बे भरते भरते स्कूल की बस आ गई ।


फिर दौड़ी मैं सँभालने रोज़गारी अपनी,

और जुट गई काम काज की उलझनों में,

शाम को देखा प्याली अभी भी है भरी हुई,

पर चाय उसमें थी ठंडी पड़ी ।


वाद विवाद में उलझती कभी सुलझती रही,

देर सवेर जब मैं वापस घर पहुंची,

तो कुछ नन्हे सपनों में रंग भरे,

उसके शब्दों को आकार दिया उनमें थोड़ी हुंकार भरी ।


कुछ नई फरमाइशें भी थी,

तो कुकर की सीटी फिर से बजी,

फिर एक ओर बिखरे कपड़े समेते,
 
तो उस ओर नींद की लोरी गा कर सुनाई ।


अब तक थक गई थी काया मेरी,

पलकों में भी नींद भरी थी, 

पर देखा कई पन्ने इधर उधर हो गए थे,

उन्हें समेत लूं, नयें जोड़ूंगी फिर कभी ।।