Monday, 2 May 2022

वो मेरा अपना नि रुपम है..



स्याही भरी है मैंने आज अपनी कलम में,
पुराने शब्दों को ही फिर से पिरोने,
बड़े दिनों बाद कुछ पल मिले फुर्सत के,
जब नहीं रखने हैं हिसाब घंटों के।

तो सोचा लिखूं उस अपने के बारे में,
जो कन्धे से कन्धा मिला साथ चले मेरे,
अलट पलट के खोजूं अपनी ही किताब में,
बारह सालों से संजोए पन्नों में।

वो लाल गुलाबी बैंगनी में फर्क तो न जाने,
पर मेरे कोरे कागज में रंग उसी ने भरे,
मेरे लब्जों संग वो भले तुक बंदी न कर पाये,
पर मेरी नज़्मों को वो बुनता है एक संगीत में।

ये लिखूं वो लिखूं क्या लिखूं उसके बारे में,
लिखने को तो बहुत कुछ बाकी हैं,
मेरे शब्द कम पड़ जाते उसकी उपमा में,
वो जो मेरा अपना ही निरुपम है ।।


एक मुद्दत से

 

एक मुद्दत से कर रही हूँ इंतज़ार तेरा,

मियाद पे मियाद चढ़े जा रही है,
और मैं खड़ी हूँ दरवाजे पे,
तुझसे मिलने की बस आस लिए ।

संजोये रखा है काफी जतन से,
सालों पुराने इस सपने को,
मिलना होगा एक दिन जरुर तुझसे,
इसी उम्मीद में हूँ पलकों को बिछाये हुए ।

तेरे आने की आहट सुनने को,
धीमे धीमे चूल्हा फूंक रही हूँ,
और तेरी मुँह दिखाई के लिए,
तिनका तिनका भी जोड़ रही हूँ ।

अब तो आँखें भी पथरा गई हैं,
सब्र का इम्तिहान देते देते,
कभी बीते समय की दुहाई देते,
तो कभी जिम्मेदारियों के हिसाब लेते ।