ऐसी छेड़ी है मल्हार कुदरत ने,
गीली मिट्टी चहकने लगी है,
फुहारों की लड़ियों में नहाते नहाते,
नदियां झरने भी गाने लगीं हैं।
काले बादल घटायें बिखेरे,
टस से मस न हो रहें,
छम-छम करती बारिश की बूँदें,
मुसलसल बस बरस रहीं हैं।
कड़ाही में खौलते तेल की महक,
और उसमें तलते हुए पकौड़े,
छन-छनकर भर रहें हैं,
अदरक वाली चाय के प्याले।
भीगे से मौसम का कहर देखो,
धुले हुए कपड़े लटक रहें हैं,
पर सूरज महाशय रजाई ओढ़े,
कहीं छुपकर सुस्ता रहे हैं।