Tuesday, 20 July 2021

Babul Ki Betiyaan

बुन लिए कुछ नज़म…

 

बुन लिए कुछ नज़म

 

घड़ी की सुई जब देखो चली ही जाती है,
छंद घंटो के जाल में फिसलती ही जाती है,
हर तरफ कश्मकश और भागमभागी जो है,
उसी बीच एक खोई हुई प्यास भी है I

शोरोगुल में कहीं गुम हो गई,
मैं भी मशगुल कहीं खो गई,
शबदों को पिरोने की वो कशीश,
धुंधली सी एक तशवीर बन गई I

पुरानी गलियों से एक आवाज आई,
दूर से ही सही पर एक आस आई,
फिर उठाई मैंने एक जंग लगी हुई कलम,
और बुन लिए फिर कुछ नज़म II