Tuesday, 20 July 2021

Babul Ki Betiyaan

बाबुल की बेटियाँ 

पुराना सा एक स्वेटर बुना हुआ,
थोड़ा मैला सा रंग भी उड़ा हुआ,
बंद अलमारी मे संजोये से रखा हुआ,
नजर पड़ी तो मुस्काते हुए हाथ फिराया।


उँगली पकड़ जिसने था चलना सिखाया,
राह दिखा के एक शिखर तक पहुंचाया,
आज की भरी महफिल मे वो दिखता नहीं,
पर वो साया कहीं साथ साथ आज भी है।


समय के पहियों संग दौड़ती हुईं हम,
एक उधेड़बुन मे उलझीं हुईं हम,
थक हार कहीं बेमन रुक जायें तो,
आसपास ही कहीं तुझे आज भी पाएं हम।


तेरे ही नाम से पहचानी जातीं हैं,
बाबुल की परछाईं हम तेरी दो बेटियाँ, 
जहां कहीं भी है तू वहीं से देख ले,
मशाल को रोशन किए खड़ी हम आज भी हैं।

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