Monday, 2 May 2022

एक मुद्दत से

 

एक मुद्दत से कर रही हूँ इंतज़ार तेरा,

मियाद पे मियाद चढ़े जा रही है,
और मैं खड़ी हूँ दरवाजे पे,
तुझसे मिलने की बस आस लिए ।

संजोये रखा है काफी जतन से,
सालों पुराने इस सपने को,
मिलना होगा एक दिन जरुर तुझसे,
इसी उम्मीद में हूँ पलकों को बिछाये हुए ।

तेरे आने की आहट सुनने को,
धीमे धीमे चूल्हा फूंक रही हूँ,
और तेरी मुँह दिखाई के लिए,
तिनका तिनका भी जोड़ रही हूँ ।

अब तो आँखें भी पथरा गई हैं,
सब्र का इम्तिहान देते देते,
कभी बीते समय की दुहाई देते,
तो कभी जिम्मेदारियों के हिसाब लेते ।


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