पुराने शब्दों को ही फिर से पिरोने,
बड़े दिनों बाद कुछ पल मिले फुर्सत के,
जब नहीं रखने हैं हिसाब घंटों के।
तो सोचा लिखूं उस अपने के बारे में,
जो कन्धे से कन्धा मिला साथ चले मेरे,
अलट पलट के खोजूं अपनी ही किताब में,
बारह सालों से संजोए पन्नों में।
वो लाल गुलाबी बैंगनी में फर्क तो न जाने,
पर मेरे कोरे कागज में रंग उसी ने भरे,
मेरे लब्जों संग वो भले तुक बंदी न कर पाये,
पर मेरी नज़्मों को वो बुनता है एक संगीत में।
ये लिखूं वो लिखूं क्या लिखूं उसके बारे में,
लिखने को तो बहुत कुछ बाकी हैं,
मेरे शब्द कम पड़ जाते उसकी उपमा में,
वो जो मेरा अपना ही निरुपम है ।।
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