घड़ी की जैसे एक सूई बन गई हूं,
मानो बस रफ्तार से चलती जा रही हूं,
सुध नही है किसी पल की,
जी जान से मगर उलझती जा रही हूं।
शाम सवेर की भागम-भागी में,
मेरा सपना अधूरा ही पाऊं मैं,
कभी जो मिले फुर्सत भी,
तो तिनके तिनके ही जुटाऊं मैं।
चुभन होती है कई तीरों की,
जब भी खुला नीला आसमान देखूं,
कोसूं के घने बादल छा जायें तुझपर,
फिर तेरी मैं भी ये मुस्कान देखूं।
कई सालों से एक आस लिए,
खड़ी हूं दरवाजे की चौखट पे,
बस थोड़ी ही दूर भरी महफिल से,
एक आगाज़ हो नयी उड़ान के लिए।
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