गिला ये मुझसे करते हैं कि उड़ती नहीं मैं,
पर जो कभी करूं जिद्दो जहद छूने कोई ऊंचाई,कहते हैं के न फैलाऊं पर अपने मैं,
चाहत उनकी के मैं बनी ही रहूं एक परछाई।
सिकुड़ते सिकुड़ते जब दिल मैला सा लगे,
गुनगुना लेती हूं कोई तराना मैं,
और कभी बेरंगी सी लगे मंजर तो,
रंग बिखेर देती हूं किसी कोरे कागज पे।
कभी तो किसी ने पूछ ही लिया मुझसे,
क्या कुछ घंटों का इज़ाफा हो गया है मुझे?
अब कैसे बताऊं उनको आपबीती अपनी,
के सूई में धागा पीरोने को भी तरसू मैं।
कश्मकश एसी है मेरी क्या सुनाऊं,
अल्फाज़ भी पूरे नहीं पड़ रहें,
और तुकबंदी भी नहीं मिल रही,
फिर ग़ज़ल पूरी करूं तो करूं कैसे।
शीशे की बोतल में रखा ख्वाब है मेरा,
शाम ढलने से पहले तेरा दीदार कर आऊं,
तकदीर को एक नया नाम देना है मुझे,
बस किसी दिन उस नाम को जी पाऊं।
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