जिम्मेदारी के नाम पे,
मेरा खून बहा दिया,
मेरा ही कलेजा काट के,
अपने हिस्से को बचा लिया।
मेरी छवि को मैली कर,
अपना दामन साफ किया,
तुम्हारे अंदरूनी जंग ने
मेरी आँचल को जला दिया।
हर ऊँचाई तक पहुंचने के लिए,
मुझे सीढ़ी तो बना लिया,
पर अपनी मिथ्या दंभ के लिए,
मेरे परों को काट दिया।
हर एक बार मुझे अपमानित कर,
अपना मान कैसे बढ़ाए तू?
मेरी आत्मा को छलनि कर,
बारंबार मेरी चिता जलाए तू।
समय के साथ कुछ नही बदला,
कितने दिन, साल, युग बीत गए,
अपनी नजरों को बचाने हेतु,
मेरी पलकों को ही काट दिया।
आँखों को मैंने पत्थर बना लिए,
चीखों को तो कबका दबा दिया,
मेरी सिसकियाँ भी जब सुनाईं न दें,
सब जिम्मेदारी के नाम पे।।
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