रंग की डिब्बियां भी खोज लीं,
चाय की भरी प्याली जो देखी,
मन किया ले लूं एक चुस्की अभी।
काफ़ी दिन हुए फुर्सत की सांस लिए,
बिस्कुट डुबो के चाय की चुस्की ली मैंने,
हां, कुकीज नहीं बिस्कुट डुबोए,
एक लंबी सांस भर, फिर मजे लिए।
सूरज की पहली किरण के साथ,
अरसों बाद पुरवाई संग बातें की,
क्या कुछ करना था सब भूल गई,
लहराते झूले में आज बस नींद भरी।
नहीं दौड़ लगानी मुझे आज कोई,
ऐसे भी दिन होते हैं याद भी नहीं,
कल फिर भरूंगी उड़ान नई,
पर आज प्यारी है चाय की प्याली मेरी।
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