Friday, 26 May 2023

एक अधूरी सी छोटी आस

ऊंचे पहाड़ों पे चढ़ना था मुझे,
ऊंचाई नापती ही जा रहीं हूं कब से,
समंदर की लहरों से बातें करनी थी,
किनारे पर ही बैठी हूं तब से।

कभी साज़ छेड़ूं या साज़िश करूं मैं,
महल तो रेत पे ही बनाऊं मैं,
इधर कूदूं तो कभी उधर फांदूं मैं,
पर जा न पाऊं दीवार लांघ कर मैं।

मन को समझाऊं पर बहलाऊं तो कैसे,
नज़रें न मिला पाऊं अपनी ही नज़रों से,
आंचल फैलाऊं फिर झोली भरूं कैसे,
जोड़ रही हूं तिनके ही बरसों से।

एक उधेड़बुन एक खलबली सी है,
मानो मेरे अंदर कुछ सनसनी सी है,
एक अधूरी सी छोटी सी आस,
मेरी नींदे उड़ाती आज भी है।

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