जिसे पूछो कोसे अपनी किस्मत को,
दुहाई दे बिखरे हुए सपनों की,
चाहे यही कि टूटी फूटी तकदीर की,
काश थोड़ी मरम्मत ही हो जाती।
काश होता कभी ऐसा भी,
फेरबदल हाथों की लकीरों की,
अनचाही लकीरों को काट दो,
चहिती संजोकर अलमारी मे रख लो।
मैं भी मुद्दतों से कोसे ही जा रही हूं,
बेफजूल सवालों में उलझती जा रही हूं,
पर्दे को उठाकर पर जब भी झाकूं,
एक साफ रंगीन तस्वीर ही देखूं।
मेरी अपनी ही तो पहचान है,
माथे पे जो शिकन है मेरी,
गिले क्या ही करूं खुद से मैं,
जब तजुर्बा है बालों की सफेदी मेरी।
तरबियत और तालीम की बदौलत ही,
इस ऊंचाई तक पहुंच पाई हूं,
मुकद्दर के संभलने का रास्ता न देख,
अपना आसमाँ मैं खुद ही बना लाई हूं।
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