दिल जो कभी बैठ जाए,
कुछ ऐसी खबर सुनकर,
रुॅधे गले में ही अटक जाए,
एक दर्द भरी गांठ बनकर ।
होश ही न रहे जाने कितने दिन,
कब दिन चढ़ा कब शाम ढली,
करवट इधर फिर कभी उधर बदली ।
कितने ही मन्नतों पे मन्नत हैं लिए,
सितारें भी गिनवाएं दिनों-दिन,
मुद्दतों से बैठें हैं उम्मीद लिए,
पूरी होने में जाने कितने ही दिन?
अब तो वक्त भी हंसता है बस,
दुहाई देता है बीते लम्हों की,
साथी तो मेरे साथ ही है,
फिर शिकायत करूं किस अपने से?
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